मेरे संस्मरण
पेशावर में मेरा जन्म हुआ. अखंडित भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रदेश, तथा अफगानिस्तान के दक्षिण से संलग्न पेशावर, एक व्याख्यात एतिहासिक/ व्यापारिक केंद्र रहा है. जब १९४७ में भारत का विभाजन हुआ पेशावर पाकिस्तान के अंतर गया. पाकिस्तान का धर्म के आधार पर मुस्लिम धर्मावलम्बियों के लिए मिर्माण हुआ था. अत: हिन्दुओं को अपने घरों/व्यवसाय-व्यापारों को छोड़ भारत में स्थानांतरित होना पड़ा. हम दिल्ली में विस्थापित हुए. जनता का यह विस्थापरण अनोखी, विकट तथा अति दुखदायक घटना थी. इस विषय पर बहुत कुछ लिखा/दिखाया जा चुका है. हिन्दू मुस्लिम दंगों ने गृह युद्ध का वीभत्स्य रूप ले लिया था.
इस अराजकता को नियंत्रित करने के पर्याप्त प्रयत्न किये गये. देश के वरिष्ठ राजनेताओं की सुदृढ़ नीति स्थिति पर नियंत्रण करने में सफल हुई. देश को चुनौतियों का सामना करना था. व्यवस्था को सुदृढ़ तथा सुव्यवस्थित बनाने के प्रयत्नों के साथ साथ शिक्षा पर महत्व पूर्ण ध्यान रखा गया. केंद्र के साथ साथ देश के विभिन्न शैक्षणीय संस्थाओं का इस में सराहनीय सहयोग रहा है. भारत विभाजन के समय मेरी आयु ८/९ वर्ष की रही होगी. कठिन परिस्थितियों को समझ पा रही थी. बनस्थली विद्यापीठ,राजस्थान, से कुछ कार्यकर्ता दिल्ली में आये और २५ कन्याओं (बड़ी/छोटी आयु) को शिक्षार्थ अपनी संस्था में ले गये. उन छोटी कन्याओं में एक मैं थी. मैं बनस्थली विद्यापीठ छात्रावास में रही और वहां से तीसरी कक्षा से लेकर intermidiate तक की शिक्षा ग्रहण की.
मेरे परिवार में उपार्जन करने वाला कोई न होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी. अत: मुझे अपनी शिक्षा इंटर के पश्चात् छोड़ देनी पड़ी. भाग्य वश देहली university के अंतर्गत lady Shriram College की library में मुझे काम मिल गया. दो वर्ष उपरांत मेरा विवाह हो गया.
दिल्ली के लाजपत नगर के घर में आयु के लगभग चालीस वर्ष बिताएं हैं वहां! वहां मैं ब्याह कर आई थी. दो एक किराये के घरों में रह ने के पश्चात् इस एक कमरे के अपने घर में प्रवेश किया था. उसके साथ बहुत यादें जुड़ीं हैं.
धीरे धीरे यह एक कमरे वाला घर तीनतल्ले की ईमारत बन गया. उस समय गली मोहल्ले के लोग परिवार के से प्रतीत होते थे. दोनों तरफ के पडौसी तो परिवार के सदस्य से ही थे. मासीजी, भाभीजी, देवरजी जैसा सम्बन्ध था. मुझे बहु, भाभी कह कर पुकारा जाता था. लोगों के प्यार में कोई बनावट न थी. सभी एक दूसरे कि सहायता के लिए तत्पर रहते थे.
मेरे तीनों बच्चों का जन्म हुआ. मोहल्ले के बच्चों में प्यार पूर्वक खेले, बढे, पढ़े. मैं लेडी श्री राम कॉलेज में नौकरी करती थी. पास पडौस की सहायता से मेरे बच्चे कैसे पल गये पता न चला. युवा होने पर उनका विवाह भी वहीं हुआ.
Sunday, September 12, 2010
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